‘Bansuri’, Hindi Kavita by Naresh Saxena

बाँसुरी के इतिहास में
उन कीड़ों का कोई ज़िक्र नहीं
जिन्होंने भूख मिटाने के लिए
बाँसों में छेद कर दिए थे

और जब-जब हवा उन छेदों से गुज़रती
तो बाँसों का रोना सुनायी देता

कीड़ों को तो पता ही नहीं था
कि वे संगीत के इतिहास में हस्तक्षेप
कर रहे हैं
और एक ऐसे वाद्य का आविष्कार
जिसमें बजाने वाले की साँसें बजती हैं

मैंने कभी लिखा था
कि बाँसुरी में साँस नहीं बजती
बाँस नहीं बजता
बजाने वाला बजता है

अब
जब-जब बजाता हूँ बाँसुरी
तो राग चाहे जो हो
उसमें थोड़ों की भूख
और बाँसों का रोना भी सुनायी देता है!

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Book by Naresh Saxena:

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नरेश सक्सेना
जन्म : 16 जनवरी 1939, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) कविता संग्रह : समुद्र पर हो रही है बारिश, सुनो चारुशीला नाटक : आदमी का आ पटकथा लेखन : हर क्षण विदा है, दसवीं दौड़, जौनसार बावर, रसखान, एक हती मनू (बुंदेली) फिल्म निर्देशन : संबंध, जल से ज्योति, समाधान, नन्हें कदम (सभी लघु फिल्में) सम्मान: पहल सम्मान, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (1992), हिंदी साहित्य सम्मेलन का सम्मान, शमशेर सम्मान