चालीस पार की औरतें

‘Chalis Paar Ki Auratein’, a poem by Ruchi

वो सब चालीस पार की थीं,
उनके पर नहीं उग पाए थे,
पर उन्होंने सुनी थीं सुनहरे परों की बातें,
उन्होंने नारी सशक्तिकरण, उन्मूलन सुना था,
वो नहीं जानती थीं, इनके सही मायने।
पर फिर भी उन्होंने पंख उगाना चुना।

उन सब ने एक साथ सपने देखे,
सुनहरे पंखों से उड़ जाने को,
पुराने दर्द गुनगुनाये बेख़्याली में,
दवा-सा परिवर्तन की हल्दी छोपी,
हफ़्ते दस दिन के लिए आतुर हुईं,
अपनी नियति बदलने के लिए।

‘हम भी अपनी ज़िन्दगी जिएँगे’,
का स्वर सम्मिलित दोहराया,
बमुश्किल एक दो मीटिंग की,
अपनी राहतों की क़ीमत तय की,
थोड़ा सौन्दर्य सहलाया स्वयं का,
थोड़ा ज़िम्मेदारियों से हाथ ताना।

किसी ने काजल लगाकर महसूस किया,
तो किसी ने तेज़ आवाज़ में गुनगुनाकर,
किसी ने विभिन्न सेल्फ़ी में ख़ुद को क़ैद किया,
तो किसी ने ख़िलाफ़त कर बाहर जाकर,
किसी ने बेचैन सी क़लम तोड़ी
तो किसी ने ज़ोर के ठहाके लगाकर।

सब ने हफ़्ते दस दिन ख़ूब पंख फड़फड़ाये,
आसमान से नीचे की तो बात ही न की,
पर वो ज़िम्मेदार, समझदार औरतें थीं,
और समझदार औरतें ज़िम्मेदारियाँ नहीं भूलतीं,
ज़िम्मेदारियों का दायरा विकसित था,
पूरा खुला हुआ, सुरसा के मुँह-सा।

लीलना निश्चित था,
पर वो समझदार औरतें थीं,
अपने सुनहले पंख निकाल तहाये,
और रख दिए सन्दूक में सहेजकर,
फ़ुर्सत में उन्होंने उड़ना चुना,
वो चालाक हैं सब।

नहीं समझना चाहतीं,
कृत्रिम पंखों से उड़ान सम्भव नहीं,
कभी कभार फड़फड़ा,
इक दूसरे के इर्द-गिर्द,
महसूस करती हैं,
हवा से भी हल्का।

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