नौकरीपेशा औरतें

‘Naukripesha Auratein’, a poem by Poonam Sonchhatra

काफ़ी कुछ कहा जाता है इनके बारे में
उड़ने की चाह लिए
पैर घुटनों तक ज़मीन में गड़ाए
दोहरी ज़िंदगी जीने वाली ये औरतें
ईश्वर की बनायी
एक ऐसी ऑटोमेटिक मशीन हैं
जो कभी भी
सिर्फ़ पैसों के लिए काम नहीं करतीं

ये सुनती हैं पास-पड़ोस की कानाफूसी से लेकर
पति की मीठी झिड़की तक
साथ ही सास के कर्कश ताने भी
“कौन सा हमारे लिए कमाती हो!”
ये बात और है कि
अगर ये पैसे न कमाएँ
तो सूखी ब्रेड पर कभी भी बटर न लगे

ये बड़ी-बड़ी पार्टियों में पति का स्टेटस सिम्बल होती हैं
अगर अपनी आँखों के नीचे के काले घेरे
पूरी कुशलता के साथ मेकअप से छुपा सकें..
ठीक वैसे ही जैसे सास की भजन मंडली के लिए
बेहतर नाश्ते के साथ बेहतर उपहारों की व्यवस्था कर
ये अपनी सास के गर्व का कारण बनती हैं

सुबह बस पकड़ने की दौड़ लगाते समय
जो बात इन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करती है
वो यह कि निकलने के पहले गैस का नाॅब बंद किया या नहीं,
और वापस लौटते समय
यह परेशानी रात के खाने, सुबह के नाश्ते से लेकर
बच्चों के होमवर्क तक
चिंता के एक पूरे ब्रह्माण्ड का सृजन करती है

सुबह से सुबह की इस दौड़ में
अगर उनकी चेतना को
पूर्ण रूप से कोई झकझोरता है
तो वो है सुबह का अलार्म

रात एक चुटकी बजाते ही निकल जाती है,
वे इतना थक जाती हैं
कि ये भी भूल जाती हैं
कि वो क्या वज़ह थी
जिसके लिए वे नौकरी करना चाहती थीं

स्वयं के अस्तित्व की लड़ाई में स्वयं को ही गँवा देना
तुम ही बताओ
ये कहाँ तक उचित है…?

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