कोई उस औरत को बतलाए
आख़िर क्यों दे रही है वह किसी को
अपनी ज़िन्दगी से जुड़े सवालों के जवाब?
आख़िर कब बन्द होगी
दीवार में ठुकती कील-सी
प्रश्नों की ठक-ठक

क्यों आँखें खुलते ही कोई भी
सुबह
बेमानी जिरह करने को सिर पर हो जाए सवार
चढ़ते हुए
किराए-सी मोहलत में मिली
बन्द खिड़कियों से सर फोड़ती साँसें
ऊपरवाले से माँगा उधारी तन
रेहन रखे सपने
क्यों हो पूछताछ अपने मन की
मनमानी की?

हाँ है…
अपने पंख, अपनी उड़ान, अपना आकाश
तो फिर
बचे-खुचे पल यदि बन जाएँ कैन्वस
इच्छाएँ
असहमतियों, अस्वीकारों, वर्जनाओं के लबादे उतार
सपनों के समुद्र में लगा दें छलांग
मुट्ठी में बन्द रंगों का किसी को क्यों दे हिसाब
वह औरत?

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