ढहेंगे कई गढ़ और क़िले

‘Dhahenge Kai Gadh Aur Qile’, a poem by Saraswati Mishra

[उन तमाम स्त्रियों की ‘हत्याओं’ के लिए, जिन्हें हम मृत्यु मानते रहे]

एक:

मेरी धड़कनों में धड़कती हैं
साथ-साथ कई और धड़कनें,
उन धड़कनों के भारी बोझ तले
पिस-पिस जाती हूँ मैं,
चूर्ण-चूर्ण हुआ मेरा शरीर
पुनः धारण कर लेता है नवकाया,
और मैं पुनः अभिशप्त हो जाती हूँ
अपने जीवन में कई और जीवन जीने के लिए।

दो:

छाया के साथ प्रतिच्छाया सी
हर क्षण वो मुझमें हैं, मैं उनमें,
चरम पर पहुँचा उनका दुःख भी
सिसकने लगता है मुझ में,
रात-रात भर चींसती हैं चोटें,
उनकी कई-कई दिनों की भूख
उफान मारती है मेरे सिकुड़े पेट में,
जलती सिगरेटों के काले धब्बे
चमक उठते हैं मेरे शरीर पर,
सफ़ेद आसमान में काले तारों की तरह
बेल्ट से बनी अनगिनत स्याह धारियाँ
तब्दील कर जाती हैं मुझे ज़ेड फॉर ज़ेबरा में
जो देखा था अपनी पहली पुस्तक में,
उनके हाथों में गड़ी कीलें
मुझे अक्सर टाँग देती हैं मेरे ही तख़्त पर
सलीब पर टंगे ईशु की तरह,
मैं अब भी करती हूँ इंतज़ार
उखाड़े गए नाख़ूनों के पुनः उगने का।

तीन:

कई-कई सौ चीख़ें जज़्ब हैं मुझ में,
उनका दर्द महसूस कर, हो रही हूँ मजबूत,
इकठ्ठा कर रही हूँ
मरे हुए सपनों को,
इच्छाओं की लाशों को,
घरौंदों के अवशेषों को,
विश्वास के नुचे पंखों को,
मानवता के पैरों में पड़ी भारी ज़ंजीरों को,
और, इकठ्ठा कर रही हूँ अपने भीतर
उन सारी कातर चीख़ों, छटपटाहटों को
जो अंततः विस्फोटक बना देंगी मेरे शब्द
और शब्दों के इस विस्फोट में
ढहेगे कई गढ़ और क़िले,
अंततः हस्तांतरित होगी सत्ता
और मैं महसूस कर सकूँगी अपने सीने में
केवल अपनी… बस अपनी धड़कन…

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