स्वघोषित उद्देश्यों को
प्रतीक मान
मन चाहे कपड़ों से निर्मित ध्वज
दूर आसमान की ऊँचाइयों में—
फहराने भर से
लोकतंत्र की जड़ें
भला कैसे हरी रहेंगी?

तुम शायद नहीं जानते
भरे बादल को
पेट का प्रतीक मान लेने से
यह पंचभूता नहीं मानता
पानी के समय पानी
रोटी के समय रोटी
सक्षात माँगता है।

शांति का प्रतीक
टुकड़ा-भर सफ़ेद कपड़ा
बरसों बाद भी
मुठ्ठी-भर देश को
चैन-ओ-अमन
कहाँ दे पाया है?

हरित क्रांति का प्रतीक
तुम्हारा हरा रंग
आयात से चलकर
निर्यात तक
कहाँ पहुँच पाया है?
….और अड़तीस साल बाद भी
तुम्हारी राष्ट्रीयता को
निष्ठा
और
बहादुरी के रंग में
कहाँ रंग पाया?

हाँ, यह ज़रूर है
तुम्हारा केसरिया
रंग लाया है
तभी तो
हर देशवासी
बे-ईमानी भ्रष्टाचार
भूखमरी
ग़रीबी
बे-रोज़गारी
और
देशद्रोह के रंग में
आकण्ठ रंग गया है
और इनके समक्ष
बलिदान के लिए
हिम्मत के साथ
डटा हुआ है।

चौबीस तीलियों वाला—
धर्म-चक्र आज भी
साम्प्रदायिकता की गाड़ी
उत्तर से दक्षिण
पूर्व से पश्चिम तक
कितनी बे-शर्मी से ढो रहा है,
और तुम्हारा लोकतंत्र
तिरंगा ओढ़
धर्म-निरपेक्षता की
झूठी
गहरी
नींद सो रहा है।

ओम पुरोहित कागद की कविता 'हम बोले रोटी'

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ओम पुरोहित 'कागद'
(5 जुलाई 1957 - 12 अगस्त 2016)

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