जीजाजी के द्विअर्थी चुटकुलों पर
बेलौस ठहाका लगाकर
परिपक्वता का असफल अभिनय करती,
मेकअप की परतों में छुपाए, चोटों और आँसुओं के कई रंग।

अपने फूहड़ सम्वादों में
ज़ोर से हँसते
प्यार भरी नज़र से
यों देखते जीजू दीदी को
जैसे दुनिया की सब स्त्रियों को चुनौती हो।

दम्पति की प्रेममय तस्वीर खिंचाने
जीजू खींचते हैं बाँह से
दीदी को अपनी तरफ़।
उनके कांधे पर हाथ रखते
और खड़े होते
फ़ोटोजेनिक कोणों और मुद्राओं में दोनों,
विजयी दाम्पत्य के
अनुकरणीय उदाहरण की तरह I

सुहागिन की सस्ती प्रतिलिपी
कभी दुत्कारी हुई निरीह, घबरायी
और कभी लुटी-पिटी
पालतू पशु-सी हमारी दीदी।

सुषमा सक्सेना की कविता 'शिकार के बखत चाची'

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