आ गयी चाची, साड़ी सरियाती, निहाल, निश्चिन्त।
अपमान के ज़हर के दो घूँट पिए तो क्या हुआ?

अब वहाँ क्या मालूम, बाथरूम मिलता कि नहीं मिलता।

चाची की ज़िन्दगी में निर्णयों के विकल्प बड़े अजीब हैं,
चुनती आयी हैं इस अपमान
या उस अपमान या किसी और अपमान में से एक।

क्या ज़िन्दगी है चाची की और क्या ताक़त है उनमें
उनके सामने के विकल्पों में सम्मान कभी रहा ही नहीं, हालाँकि विकल्प कई रहे हैं।
उनके चरणों में अपनी नम आँखों का पानी अर्पित कर देना ही उन्हें सच्चा प्रणाम होगा।

खां खां खां
कुछ ऐसी ही ध्वनि से हँसते हैं चच्चा हमारे
दिन में सौ बार कहते हैं हँसकर-
‘अरे क्या कहें इन औरतों का…’
वैसे चच्चा ये भी कहते हैं कि उन्हें चाची से बड़ी उल्फ़त भी है।

और चाची?
चाची भी कहती हैं-
‘अब अच्छे या बुरे जैसे भी हैं, यही हैं, इन्हीं से बंधी हूँ मैं तो’।

चच्चा तैयार हैं, रेशमी कुर्ते और लट्ठे के पाजामे में
और चाची भी तैयार ही हैं
शादी का न्योता है, जाना है…

चच्चा कहते हैं, अरे ये औरतें…
चलो भी अब, और कितना तैयार होना है!
चाची सम्भालती हैं कपड़े, एक मिनट… बस एक मिनट और दौड़ पड़ती हैं बाथरूम की ओर
चच्चा भृकुटि चढ़ाते हैं…’खां… खां… खां…’
तम्बाकू की पीक पच्च से थूकते हैं
‘शिकार के बखत कुतिया…’

…आख़िरी शब्द कुछ सुनायी नहीं दिया!
फिर पीक भर आयी चच्चा के मुँह में,
और व्यंग्य और तिरस्कार से दो टके की सरकारी नौकरी में
चोट खाए कुण्ठित पौरुष की धार से
चच्चा फिर कहते हैं- ‘शिकार के बखत कुतिया…’

फिर एक शब्द मुँह में।

क्या कहते हैं चच्चा?
किसी ने धीरे से बरजा मुझे,
बार-बार मत पूछो, कोई अच्छी बात नहीं…।
अरे वो एक कहावत होती है,
जब शिकार में संग जंगल ले जायी गई कुतिया, ऐन वक़्त पर…
रहने दो, तुम मत पूछो क्या करती है कुतिया, शिकार के बखत।