घर संसार में घुसते ही
पहिचान बतानी होती है
उसकी आहट सुन
पत्‍नी-बच्‍चे पूछेंगे— ‘कौन?’
‘मैं हूँ’ — वह कहता है
तब दरवाज़ा खुलता है।

घर उसका शिविर
जहाँ घायल होकर वह लौटता है।

रबर की चप्‍पल को
छेद कर कोई जूते का खीला उसका तलुआ छेद गया है।
पैर से पट्टी बॉंध सुस्‍ताकर, कुछ खाकर
दूसरे दिन अपने घर का पूरा दरवाज़ा खोलकर
वह बाहर निकला

अखिल संसार में उसकी आहट हुई
दबे पाँव नहीं
खाँसा और कराहा
‘कौन?’ — यह किसी ने नहीं पूछा
सड़क के कुत्ते ने पहिचानकर पूँछ हिलायी
किराने वाला उसे देखकर मुस्‍कुराया
मुस्‍कुराया तो वह भी।

एक पान ठेले के सामने
कुछ ज़्यादा देर खड़े होकर
उधार पान माँगा
और पान खाते हुए
कुछ देर खड़े होकर
फिर कुछ ज़्यादा देर खड़े होकर
परास्‍त हो गया।

Book by Vinod Kumar Shukla:

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विनोद कुमार शुक्ल
विनोद कुमार शुक्ल हिंदी के प्रसिद्ध कवि और उपन्यासकार हैं! 1 जनवरी 1937 को भारत के एक राज्य छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव में जन्मे शुक्ल ने प्राध्यापन को रोज़गार के रूप में चुनकर पूरा ध्यान साहित्य सृजन में लगाया! वे कवि होने के साथ-साथ शीर्षस्थ कथाकार भी हैं। उनके उपन्यासों ने हिंदी में पहली बार एक मौलिक भारतीय उपन्यास की संभावना को राह दी है। उन्होंने एक साथ लोकआख्यान और आधुनिक मनुष्य की अस्तित्वमूलक जटिल आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति को समाविष्ट कर एक नये कथा-ढांचे का आविष्कार किया है।