‘Gunahgaar’, a poem by Avinash Kumar

उन सब सवालों के लिए
जिन्हें पूछने का वक़्त कभी नहीं आया,
उन सब जवाबों के लिए, जो
दिए नहीं गए और सुने नहीं गए,
उन सारे हाथों के लिए, जो ठिठुरते रहे
सड़कों पर भीख माँगते
और उन सारे हाथों के लिए, जो बढ़े मगर
मदद नहीं रहम के लिए,
उन सभी कहानियों के लिए, जिन्होंने
साथ छोड़ दिया अपने किरदारों का,
उन सभी गीतों के लिए, जिन्होंने
युद्ध के समय भी की प्रेम की बातें,
और उन सभी के लिए, जो
बचते रहे एक अदद गुनाह करने से
और जिनकी मदद को कोई नहीं आया
एक अदद गुनाह करने पर,
कौन होगा गुनहगार?
हम सबके मरने का,
हम सबके मरने पर?

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अविनाश आवयुक्त
ढूंढ रहा हूँ कंकर पत्थर खोज रहा हूँ तिनका तिनका कैसे होते होंगे राही न घर न मंजिल हो जिनका ।

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