हरहू

उबला हुआ मौसम
सीने में खौलता लहू,
अबकी बार जो बरसात ना हुई
लटकेगा पेड़ से
एक और हरहू।

पिछली बरस जब बरसी थी बरखा
तो डूब गया था सारा गाँव
फसलें चढ़ गई थीं भेंट
उसी बाढ़ के
जो बनकर आ गयी थी काल
पिछली दफ़ा,
आँखों से रिसता पानी
जमीन पर तैरते पानी
से ज़्यादा भयावह था
और सीने की जलन
मिलकर उन आँसुओं से
भाप बनकर उड़ रही थी निरन्तर
उस कलेजे से जो
भर चुका था
दुःख की ऊष्मा से।

सुना है पिछले साल
जाड़े की फसल भी
कुछ खास नहीं हुई थी
और कड़कड़ाती ठण्ड में
ठिठुरते दिल को
सेंकने की कोशिश में
पड़ा रहा वो रात भर
ठण्डे पड़े चूहे के पास
और विवशता
सुलग रही थी उसकी,
देखकर धँसते पेट,
हाड़ के ढाँचे में बदलते शरीर
उन कुलदीपकों के
जिनको जलाये रखा था
भरकर उन दीपों में तेल
ख़ून, पसीने का।

इतना मज़बूत कलेजा
जो बनकर चट्टान तपती धूप में भी
बैलों के साथ जुटा रहा,
मुश्किलें चाह कर भी
डिगा न सकीं थी जिसे,
उसे हिलाकर रख दिया था
इस असह्य पीड़ा ने
क्योंकि,
अब रीते दीये में
बुझती लौ को देखना,
अपनी औलाद का रोज़ सो जाना
मुस्कुरा कर
भरी आँखों और खाली पेट से
देखा न गया उससे
और वो विदा हो गया
बेटी की विदाई से पहले।

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