‘Hum Bail The’, a poem by Rahul Boyal

हमने हल जोते
खेतों की सफ़ाई में हाथ बँटाया
कुओं से पानी निकाला
हमने ऊख पेरी
घाणी से तैल निकाला
हमारी पीठ ने तुम्हारे कूल्हे ढोये
बग़ैर हमारे सारे चूल्हे रोये
हमारे दु:ख से धरती हरी थी
हमने हस्ती गिरवी धरी थी
हम बस गोबर-मैल लगे
हाँ, हम नहीं थे पक्की छत की मानिन्द
पर हम निर्धन की खपरैल थे
हम बैल थे
केवल बैल थे।

हम भादो की काली चौदस को जन्मे
और केवल अमावस तक जीवित रहे
बस एक दिन जिये,
पोला-पिठोरा में एक दिन सजे
बस एक दिन तुम्हारी खीर खायी
बस एक दिन पूरणपोळी चखी
तुमने हमारे सींग सँवारे
पर नकेल धँसा कर यूँ ही रखी
कहीं अन्नमाता ने गर्भ धारा
कहीं धान में उतरी दुग्ध की धारा
बस सधा तुम्हारा काज
बस मना तुम्हारा पर्व
हम जोड़ी में दौड़े
दौड़कर जिताया तुम्हें
मगर हम हारे
कि हम नहीं थे झूरी के हीरा-मोती
हम बिगड़ैल थे
हम बैल थे
केवल बैल थे।

हम वृषभ थे
हम ऋषभ थे
हम बारात में तुम्हारे रथ बने
कहीं खिलौनों की तरह बिके
कभी मिट्टी के हुए
कभी पत्थर के हुए
सड़क पे कट के मरे
हम आवारा कहलाये
पीछे पड़े डण्डों से डरे
हमारे खेत छूटे
हमारे भाग फूटे
हम ताक़तवर थे
न कि ग़ुस्सैल थे
हम बैल थे
केवल बैल थे।

हमने साथी खोये
हम कितने तन्हा रोये
हम गाढ़ी अँधेरी रात में
तेज़ धूप, बरसात में
बर्फ़ानी शीत में तुम्हारे काम आये
हमने लकड़ियों के गट्ठर खींचे
हम चलते रहे आँखें मींचे
हमने छींके देखे
हमने खुराई झेली
हमने जलते जंगल देखे
हमने उगते मक़तल देखे
हम भूखे रहे, खेतों को छाना
सब ने हमें लावारिस माना
हम शिव के नन्दी नहीं थे
हम शैल थे
हम बैल थे
केवल बैल थे।

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