हम क़स्बाई लोग

‘Hum Qasbaai Log’, poems by Namrata

1

हम क़स्बों में रहने वाले
हम क़स्बाई लोग
गाँवों से जुदा, शहरों से ख़फ़ा।
क़स्बाई रास्ते हमारी नसों में हैं,
क़स्बाई संस्कृति हमारे रक्त में घुली है।
हम मिसालें भी देते हैं, और
मशालें भी जलाते हैं
पर सीमित संसाधनों में-
कम बिजली, कम पानी,
कम बाज़ारी रियायतों पर।
हमारी ज़रूरतें-
मुक़दमों सी लम्बित, व
हमारी आशाएँ-
सरकारी फ़ाइलों के ढेर सी।
हमारा तयशुदा सफ़र
सदर से बड़े शहर तक
लोकल ट्रेन/बस से
ताज़ी सुबह में।
सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज है
हमारा शहरी मानक
बिला शहरी रंग-रौशन के।
कुछ इक्के-दुक्के
सतही सियासी गुट,
कुछ सहमे हुए लोग।
हमारी मुहल्लादारी-
एक अनमने अपनेपन
को घेरे हुए।
हमारा बैर, हमारी अदावतें
बड़ी कमज़ोर और कमउम्र।
बस बोलचाल बन्द तथा
तीसरे से ख़ामियाँ गिनाने तक;
पर हम
सुख में शामिल, दु:ख में कातर।
हमारे क़स्बे का ‘मार्केटिंग भूगोल’
सिर्फ़ इतना ही है कि
मतलब भर के इक्के-दुक्के
‘बेस्टसेलर’ हैं यहाँ-
हर क़िस्म के कारोबार में।
फलता-फूलता है
हमारा क़स्बा भी,
नई कॉलोनी, नये मुहल्ले
चिपक रहे नित
उसी ‘शहरी मानक’, शिक्षा,
रोज़गार एवं यातायात की
सुविधा शर्तों पर।
महानगरों के विस्तार तक, या
महासागरों के पार तक,
मल्टीप्लेक्स से माॅल तक
वर्ल्ड टुअर से मेट्रो तक;
हर ज़ाती जगहों में
हम अपनी क़स्बाई रंगत
लिए फिरते हैं।
(ये रंग है कि छूटता ही नहीं)

2

हम क़स्बो में रहने वाले
हम क़स्बाई लोग….
हमारे लिए गाँव एक ऐसी डिश है
जिसे हमने देखा तो है
पर चखा नहीं
हमारे लिए शहर एक ऐसी पोशाक है
जिसे हमने जाना तो है पर पहना नहीं।