स्वप्न की आकाँक्षा में
नींद ही जब रूठ जाए
सर रख के कांधे पर तुम्हारा
नींद का आह्वान करूँगी
मैं इससे ज़्यादा क्या कहूँ

विरह की तपती हुई
जब रेत में तन जल उठेगा
दग्ध होठों पर तुम्हारे
दो अश्रु बन कर चू पड़ूँगी
मैं इससे ज़्यादा क्या कहूँ

पूर्ण हों जब शब्द सारे
एक पल को ठहर जाना
और गुनगुनाना इक पंक्ति आधी
फिर मैं उसे पूरा करूँगी
मैं इससे ज़्यादा क्या कहूँ

लक्ष्य के पथ में अगर
घनघोर तम में घिर गए जो
उस रात में इक लौ जलाये
तुमसे आगे चल पड़ूँगी
मैं इससे ज़्यादा क्या कहूँ

संसार ही है वेदना
ये मानना तुमको पड़ेगा
कर पार सीमा विश्व की
उस पार मैं तुमसे मिलूँगी
मैं इससे ज़्यादा क्या कहूँ!

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