इतिहास का भूत

‘Itihas Ka Bhoot’, a poem by Asheesh Tiwari

इतिहास के प्रति घृणा फैलाने वाला,
उसे नकारने वाला,
तब भयभीत हो जाता है,
जब उसके सजाये रंगीन मंचों पर
इतिहास मुँह चिढ़ाने लगता है

इतिहास के आख्यान गम्भीर और चिंतनपरक होते हैं
इनका मज़ाक उड़ाने वाला
मदारी जैसा दिखने लगता है
कभी-कभी उसका हाथ
अपने से बड़े मदारी के हाथ में जाता है
तो वह ख़ुद को मदारी के बंदर जैसा उछलता भी पाता है

इतिहास आईना है
जितना धूमिल करोगे
उतने भटके हुए लगोगे वैश्विक मंचों पर

जितना लादोगे इतिहास पर भार
गाँधी, नेहरू तुम्हें भूत की तरह डराते रहेंगे
तुम्हारे सजे मंचों पर बार-बार आएँगे
और तुम भीतर ही भीतर बौने हो जाओगे
तब इतिहास हँसेगा तुम पर…