जेल

‘Jail’, a poem by Vijay Rahi

मैं जानता था
पर कितना कम जानता था
कि जेल सिर्फ़ एक कोठरी का नाम है।

बचपन में गाँव के
हमारे जैसे बच्चों को
तिलक-छापे लगाए हुए
जो भी बुज़ुर्ग आदमी दिखता
हम अपना हाथ आगे कर देते
‘बाबा! देखियो मेरो हाथ!’

मेरे लिए हाथ की रेखाएँ पढ़ना
बिल्कुल ऐसे है
जैसे चम्पा के लिए काले अक्षर।

जब हस्तरेखा पढ़कर बताया गया
‘बेटा! सरकारी नौकरी तो लग जायेगो
पर साथ में जेल भी जायेगो…’

मैं डर गया था
डर के कारण चुप्पी साधे रहा कई दिनों तक
थाने की गाड़ी सपने में दिखती थी मुझे।

मैंने हर सम्भव कोशिश की
इस डर से निकलने की।
मैंने जेल जाने के तमाम कारण ढूँढे
और उनसे सात कोस बचकर चलता।

डर को मात देने के लिए
मन को बहलाया तमाम तरीक़ों से
मैं जो भी कर सकता था, मैंने किया।

आज बरसों बाद
जब सोचता हूँ इन सब के बारे में
मुझे मेरी अक़्लमंदी पर तरस आता है,
रूलाई आती है
और रूलाई के बाद हँसी भी।

तुम्हारे जाने के बाद मुझे ज्ञात हुआ
कि इस भीड़ भरी दुनिया में
अपने प्रिय से दूर रहकर
अकेले तिल-तिल कर मरना
क्या किसी जेल से कम है?

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