‘Jakdan’, a poem by Shravan

मैं शनैः शनैः जकड़ता चला जा रहा हूँ
अपने आपको
कहाँ? मैं नहीं जानता
सिर्फ़ है एक शून्य
जो किसी दलदल से कम नहीं
जितना बाहर निकलने की कोशिश करता हूँ
उतना ही धँसता चला जाता हूँ
उतनी ही अधिक जकड़न

इस जकड़न से निकलने की
छटपटाहट
जैसे है मरुस्थान
और भटक गया है एक खग
इसी बीच वक़्त
रेत-सा छूटता चला जा रहा है
एक कोरा काग़ज़
जिसमें
न कोई क्षणवादी लकीरें हैं
न कोई ठहराव के हाशिये
जहाँ कोई स्मृतिशेष की लिखावट भी नहीं

विषाद ने आकर
लीप दिया है अन्तर्मन का आँगन
और छप गये हैं उस पर
निराशा के अनचाहे पदचिह्न
जो हैं अब मेरी जकड़न की
विवशता के साक्ष्य
जिन्हें हँसना है मेरी दुर्दशा पर
एक समय अन्तराल के बाद

धूप का धब्बा
उस रोज़ जब चला आया था
और आकर ठहर गया मेरी देह पर
देह के उस हिस्से पर
जिसे कभी मैं चेहरा कहता था
जहाँ आँखें थीं
और आँखों के साथ दृष्टि
उसी दृष्टि के पार
अथाह सागर
जिसे मेरी
सिमटती दृष्टि और मरती सम्वेदना ने
सूखने को विवश कर दिया है

अब तो मैं स्वयं के लिए भी ख़ुश नहीं होता
या अब तो मैं स्वयं के लिए भी नहीं रोता
तो फिर वो क्या है? मेरे अन्दर
जो रोता है
और रोता चला जाता है
जो हँसता है
और हँसता चला जाता है
इसी रोने-हँसने के बीच तड़पकर
मर जाता है
एक दुर्गन्ध छोड़कर

वो क्या है?
जिसके साथ
मेरी चेतना भी सहज नहीं हो पाती है
और अवचेतन में
जिसका ढेर भरता ही चला जाता है
कचरा लाकर जैसे पटक दिया जाता है
किसी डम्पयार्ड में
जहाँ लौटेगी मेरी चेतना
अपना कुछ खोया सामान खोजने
किसी दिन
शायद

कभी-कभी तो लगता है
कि जो बहा चला जा रहा है
उसी के साथ मैं बह क्यों नहीं जाता?
क्यों खड़ा कर लेता हूँ मैं
स्वयं को उस ठूँठ की भाँति
जो रोक लेता है
अनायास ही नदी का रास्ता
लेकिन
उसी ठूँठ का हरित अतीत
मुझे भी मेरे अतीत का धुँधलका
दिखला जाता है
एक अनुमान की अस्पष्ट धारा
कोई पर्णहरित था क्या कभी?

बह जाना भी कितना आसान है
त्याग दो स्वयं को
जो आ रहा है पाते चले जाओ
जो जा रहा है खोते चले जाओ
ना पथ का प्रश्न है
ना लक्ष्य का कोई उत्तर
बस बहे चले जाओ
लेकिन वहाँ भी एक जकड़न
बहना तय करता है कोई और
आप सिर्फ़ बहते हैं
कहते नहीं
जैसे बहती चलिए जाती है एक लाश
तो फिर जीवन क्या है?

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