जिस दिन से आए
उस दिन से
घर में यहीं पड़े हैं
दुःख कितने लंगड़े हैं!

पैसे,
ऐसे अलमारी से
फूल चुरा ले जाएँ बच्चे
जैसे फुलवारी से
दंड नहीं दे पाता
यद्यपि—
रंगे हाथ पकड़े हैं।

दुःख कितने लंगड़े हैं!

नाम नहीं लेते जाने का
घर की लिपी-पुती बैठक से
काम ले रहे तहख़ाने का
धक्के मार निकालूँ कैसे?
ये मुझसे तगड़े हैं!

दुःख कितने लंगड़े हैं!

रमेश रंजक की कविता 'परदे के पीछे'

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