कभी तुम मिलो तो बताऊँ मैं

‘Kabhi Tum Milo Toh Bataun Main’, a nazm by Tasneef Haidar

कभी तुम मिलो तो बताऊँ मैं

ग़म ए ज़िन्दगी की अमानतें हैं तुम्हारे नाम लिखी हुई
ये इबारतें ये कहानियाँ कई दूसरों की पढ़ी हुई
मेरे हम-सफ़र मुझे चाहिए कोई रात और जली हुई
कोई और शेर कहा हुआ, कोई और बात बनी हुई

कभी तुम मिलो तो बताऊँ मैं

मुझे इन्तिज़ार के शौक़ में कई रास्तों का सफ़र मिला
तुम्हें ढूँढने के ख़याल में, कई और लोगों का घर मिला
कभी इश्क़ का नया ढब मिला, कहीं हुस्न का नया दर मिला
मुझे नज़्म कहने का फ़न मिला, मुझे जागने का हुनर मिला

कभी तुम मिलो तो बताऊँ मैं

मुझे ख़्वाब देखने का शौक़ था, मेरी नींद सबने उजाड़ दी
मुझे तुमसे मिलने की चाह थी, मेरी पीठ ग़म ने पछाड़ दी
जो तुम्हारे नाम की तख़्ती ए शब ए ग़म हवा ने उखाड़ दी
मेरी आँख ने वो बहाया ख़ूँ, मेरे दर्द ने वो दहाड़ दी

कभी तुम मिलो तो बताऊँ मैं

मेरे पाँव ज़ख़्मों से चूर थे, मेरे हाथ रेज़ों से लाल थे
मेरी नींद माइल ए ख़ुद-कुशी, मेरे ख़्वाब रू ब ज़वाल थे
मेरे दिल में कितने ख़याल थे, मेरे लब पे कितने सवाल थे
मेरी जान! तुम भी अजीब थे, मेरे यार! तुम भी कमाल थे

कभी तुम मिलो तो बताऊँ मैं

तुम्हें एक लम्हे के वास्ते कभी मेरा दर्द दिखा नहीं
मेरे शेर का, मेरी नज़्म का कुछ असर भी तुमपे हुआ नहीं
मैं ये मानता हूँ मेरे सनम कि तुम आदमी हो ख़ुदा नहीं
मगर इस मरीज़ ए फ़िराक़ की क्या तुम्हारे पास दवा नहीं

कभी तुम मिलो तो बताऊँ मैं

कभी तुम मिलो तो बताऊँ मैं कि मैं थक गया हूँ सफ़र से अब
मेरा दिल है दर्द का आशना, मुझे डर है राहगुज़र से अब
मैं ये चाहता ही नहीं सनम कोई और गुज़रे इधर से अब
ये उदासी आँख से छीन लो, ये फ़िराक़ टाल दो सर से अब…

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