कशमकश

‘Kashmakash’, a poem by Poonam Sonchhatra

क्षितिज पर डूबते तारे-सा है हमारा प्रेम

मैंने मुस्कुराहटों की एक गुल्लक बनायी थी
और तुमसे मिलने के ठीक पहले ही
उसे तोड़ा था

तुम्हें नहीं मालूम, लेकिन
उधार की मुस्कुराहट पर रीझ गये तुम

अब जबकि तुम नहीं हो
और गुल्लक की सारी मुस्कुराहटें भी ख़त्म हो चुकी हैं
मैं कशमकश में हूँ

हक़ जताने में जाने वाले को रोकना भी शामिल होता है

तसल्ली इस बात की है कि
इस मौसम में घर के बाहर भी उतनी ही बारिश है
जितनी कि घर के अंदर,
आँसुओं से भी चेहरा धुला-धुला सा लगता है

प्रेम की सबसे अधिक उद्घोषणा करने वाले ही
प्रेम में सर्वाधिक स्वार्थी सिद्ध हुए हैं

मुझे अक्सर यह कहा गया है
कि मैं बेहद अच्छी हूँ,
हाँ मैं जानती हूँ
कि यह मेरी सबसे बड़ी ख़राबी है…

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