स्तब्धता एक बेजोड़ निकास है—
सदियों से मुलाक़ातों, हादसों और
प्रव्रजनों को देखते हुए हम स्तब्ध खड़े हैं

नदियाँ देखकर बाँध स्तब्ध खड़े हैं
गाड़ियाँ देखकर पुल
तुम्हें देखकर मैं स्तब्ध खड़ा हूँ
मुझे देखकर तुम

हम दोनों एक-दूसरे की
अशक्त अवस्था पर हँसते हैं
ग़ौरतलब यह है कि
रोज़ अख़बार पढ़कर अफ़सोस जताते हैं
अफ़सोस जताना मुफ़्त का काम है
एक असहज ध्वनि तक सीमित होता है
अख़बार पढ़ने के बाद
मैं अपने कपड़े रगड़-रगड़कर साफ़ करता हूँ

मैं पहले आँखें लिए खड़ा रहता था
अब कैमरा लिए खड़ा रहता हूँ
मेरे हाथ रोटी कमाते हुए मज़बूत नहीं हुए हैं
मैं भरे पेट का भूखा-कमज़ोर इंसान हूँ
मेरे हाथ में अगर तलवार पकड़ाओगे
छटपटाकर अपने हाथ काट लूँगा
इसकी तालीम मैंने नागरिकशास्त्र की
किताबों से पायी है

मैं सब कुछ देखता हूँ
या तो भीड़ में खड़े होकर देखता हूँ
या ओट में छिपकर

मैं काग़ज़ों पर बयान देता हुआ
हर हादसे का चश्मदीद गवाह बनता चला जाता हूँ
रोज़ तैयार दिखना मैंने तवायफ़ों से सीखा है
लिहाज़ा मेरी पीठ छिली हुई है
लेकिन आँखें चेहरा देखती हैं, पीठ नहीं

मैं भरसक कोशिश करता हूँ समय काटने की
लेकिन समय मुझे काटता जाता है
घण्टे की सुई मेरी आँत में जा धँसी है
मिनट की आँख में
और सेकण्ड की सुई जीभ और तालु के बीच फँसी है

प्रार्थनाओं की शृंखला में
स्तब्ध मूर्तियों के सामने कतारबद्ध
मुझे स्तब्ध खड़ा देखकर
इतना अनुमान लगाया जा सकता है कि
स्तब्धता एक ईश्वरीय गुण है
मानवीय नहीं।

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