न सीने पर हैं तमगे
न हाथों में कलम है
न कंठ में है वीणा
न थिरकते कदम हैं
इस शहर को छोड़कर
जिसमें घर है मेरा
उस ग़ैर मुल्क जाके
लोगों के मुँह देखता हूँ
भाई लोगे क्या? खजूर बेचता हूँ..

सरहद कुछ डराती
हैं पाँव काँप जाते
बेटी के फिर टूटे
खिलौने याद आते
बाप हूँ बना जब
कर्त्तव्य है निभाना
यूँ कर ही रास्तों के
बारूद सकेरता हूँ
भाई लोगे क्या? खजूर बेचता हूँ..

कुछ तो रहनुमा हैं
और लोग कुछ बड़े हैं
मुझ जैसे तो हाथों में
हाथ बाँधे खड़े हैं
वजूद ही क्या मेरा
संभ्रांतों के सामने
ज़रूरतों के आगे
जो घुटने टेकता हूँ
भाई लोगे क्या? खजूर बेचता हूँ..

कुछ संसदों में बैठे
अखबार छापते हैं
कुछ चीखते हैं ज़िद्दी
कुछ ढाल नापते हैं
जंग जो छिड़ेगी
होंगे वही वजह भी
किस वजह से फिर मैं
यह आग सेकता हूँ
भाई लोगे क्या? खजूर बेचता हूँ..

हाँ हूँ कुछ तो छोटा
अक्ल भी थोड़ी कम है
कला से नावाकिफ़ हूँ
फलों का बस रहम है
ज़िन्दगी की कीमत
तो बात है बड़ी कुछ
किलो-दर्जनों की बातें
उँगली पे फेरता हूँ
भाई लोगे क्या? खजूर बेचता हूँ..

 

चित्र श्रेय: शरद महामना

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पुनीत कुसुम
कविताओं में स्वयं को ढूँढती एक इकाई..!

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