यह
रहस्य तो नहीं
खोज की बुनियाद है
आज फिर
मैं
उड़ने लगी हूँ बे-पर
बंजर ज़मीन पर
फूटे हैं
अंकुर
आस की दूब चरने लगा है
मन का मिरग
किस दिशा से बांधोगे तुम
इसे
काल का गिलमा भी तो
छोटा है

एकान्त होठों पर वह
विस्मित रेखा
हास्य की बात है या रुदन तीखा
कैसे देखोगे
जगती आँखों से दिन में तारे
रात का सूरज
और वीरानों में भौरों का गुँजार

गूँज उठा है
फिर वही
आदिम स्वर!

सुशीला टाकभौरे की कविता 'आज की ख़ुद्दार औरत'

Book by Sushila Takbhore:

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सुशीला टाकभौरे
जन्म: 4 मार्च, 1954, बानापुरा (सिवनी मालवा), जि. होशंगाबाद (म.प्र.)। शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी साहित्य), एम.ए. (अम्बेडकर विचारधारा), बी.एड., पीएच.डी. (हिन्दी साहित्य)। प्रकाशित कृतियाँ: स्वाति बूँद और खारे मोती, यह तुम भी जानो, तुमने उसे कब पहचाना (काव्य संग्रह); हिन्दी साहित्य के इतिहास में नारी, भारतीय नारी: समाज और साहित्य के ऐतिहासिक सन्दर्भों में (विवरण); परिवर्तन जरूरी है (लेख संग्रह); टूटता वहम, अनुभूति के घेरे, संघर्ष (कहानी संग्रह); हमारे हिस्से का सूरज (कविता संग्रह); नंगा सत्य (नाटक); रंग और व्यंग्य (नाटक संग्रह); शिकंजे का दर्द (आत्मकथा); नीला आकाश, तुम्हें बदलना ही होगा (उपन्यास)।

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