कितनी बदल गयी हो तुम
कहा आईने ने मुझसे
अब वो सूरत ही न रही जो हुआ करती थी कभी
वो मासूमियत, वो चंचलता
अरे कितनी बदल गयी हो तुम
अब तुम पहले जैसी न रही
कहा उन्होंने मुझसे
हर बात पर कितना जिरह करती हो
पहले हर बात मान लेती थी सिर झुकाकर झट से
क्या ढोंग करती थी तुम
अब वैसी सीधी न रही तुम
लम्बा सिंदूर लगाए, गले में मंगलसूत्र
और बिंदी माथे पर सजाये
उन औरतों ने कहा मुझसे
कितनी अकड़ू हो तुम
फेमिनिज़्म की बातें करती हो
खड़ी हो अपने पैरों पर चलो ये तो ठीक है
पर हो तो औरत ही तुम
ऐसे पति का जीवन ताख पर रखती हो
चूड़ी नहीं पहनती, लम्बी माँग नहीं भरती हो तुम
सिर ढंककर नहीं रहती
दबी ज़बान में नहीं कुछ कहती
कैसी उच्छृंखल हो चली हो तुम
कहा उन सबने
नहीं- कहा मैनें
मैं तो वैसी ही हूँ
जैसी थी पहले
पर अब हूँ मुखर
कभी थी अव्यक्त।

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अनुपमा मिश्रा
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