क्षोभ से भरी हुई थी वो
तड़प गयी थी इस नुक़सान और धोखे से
सामने वह भी खड़ा था निष्प्रभ
असहाय
जैसे हत्या का झूठा आरोप लगा हो।

बस… बस… अब मुझे इसके साथ रहना ही नहीं है.. गाँव चली जाऊँगी
इसे ज़रा भी शर्म न आयी
मुश्किल से काट-जोड़ के बचाया था बरसों
ख़रीदी थी कानों की बाली
बेटी ब्याहनी है, पापी ने ये भी न सोचा
निठुरे क्या दे के भेजेगा?

…प्रश्नवाचक निगाहों के सामने
हताशा से बोल पड़ा, अपने शब्दों को गटकते हुए
“ग़लती है… ग़लती है मेरी…
लेकिन क्या कान की बालियों के आगे
हमारा पच्चीस साल का रिश्ता तोड़ देगी?”

सचमुच मुक्ति की सभी व्याख्यायों पर प्रश्न चिह्न था
और उस स्त्री को चुनना था उस दिन भी, कुएँ और खाई में से एक!

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