‘Kulta’, a poem by Niki Pushkar

चूँकि,
स्त्री देह में जन्म लिया था
इसलिए,
उपहार में मिलीं उसे
ढेर सारी हिदायतें…
‘परदे में रहना’
‘ऊँचा न बोलना’
कोई कुछ भी कहे,
‘पलटकर जवाब न देना’
‘कभी तर्क न करना’
‘सब चुप सह जाना’

वर्षों उसने अनुदेशन याद रखे
शिष्टता से उनका पालन किया
सहकर, चुप रहकर, घुटकर
सुशील, सुघड़, भद्रस्त्री का
पारितोषिक भी प्राप्त किया

घुटन में पीढ़ियाँ गुजर गईं,
प्राणवायु की कमी से
छटपटाहट होने लगी,
अब यह पारितोषिक
मृत्यु का फन्दा लगने लगा,
वह दहलीज़ से बाहर निकल आयी,
नये पथ पर एकांकी चल पड़ी,
उसने घूँघट उलट दिया
उसने कलम उठायी
उसने तर्क किए
उसने पलटकर जवाब दिए
उसने प्रश्न किए…
उसने सारी हिदायतें दरकिनार कर दीं

ऐसा करते ही,
कई भृकुटियाँ तन गयीं
कई आँखों मे लाल डोरे उतर आए
भद्रजन तिलमिला गये
कइयों के सिंहासन डोलने लगे
उनके एकाधिकार पर
किसी अबला की हिस्सेदारी
भला कैसे स्वीकार्य होती…

लिहाज़ा,
उसकी गति पर अवरोध
लगाए गये,
फिर भी नहीं रुकी तो,
अब उसकी रीढ़ को तोड़ा गया…
सबसे नाज़ुक हिस्से पर चोट की गयी
उसका चारित्रिक पतन किया गया
फिर उसे ‘कुलटा’ कह दिया गया…