पतले नंगे तार से लटकी
जलती, बुझती, बटती
वो लड़की
जो तुम्हारी धमकी से नहीं डरती
वो लड़की
जिसकी मांग टेढ़ी है
अंधी तन्क़ीद की कंघी
से नहीं सुलझती
वो लड़की
जिसकी हर लट में
मोतीयों के तबस्सुम के अलावा
खरज भी है
गरज भी है
एक रात में अकेली फिरती हुई
पहेली भी है
इस अल्लहड़ लट को नहीं बांध सकते हो तुम
कि उसने दाँत
कांटों पे काटे हैं
लड़की है तो लड़के रहेगी
अब तुमसे ना डरके रहेगी
एक को मात किया तो दूसरी
इसी के कंधों पर
बढ़-चढ़ के रहेगी
लड़की है तो लड़ के रहेगी
अब तुमसे ना डर के रहेगी..

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