काव्य-संकलन: ‘शहर से गाँव’
लिप्यंतरण: आमिर विद्यार्थी

वह फूल-फूल बदन
साँवली-सी एक लड़की
जो रोज़
मेरी गली से गुज़र के जाती है
सुना है
वह किसी लड़के से प्यार करती है
बहार हो के तलाश-ए-बहार करती है
न कोई मेल
न कोई लगाव है लेकिन
न जाने क्यों…
बस उसी वक़्त, जब वह आती है
कुछ इंतज़ार की आदत-सी हो गई है मुझे
एक अजनबी की ज़रूरत-सी हो गई है मुझे
मेरे बरांडे के आगे
वह फूँस का छप्पर
गली के मोड़ पे
उखड़ा हुआ-सा एक पत्थर
वह एक झुकती हुई बदनुमा-सी नीम की शाख
और उस पे
जंगली कबूतर के घोंसले का निशान
यह सारी चीज़ें
कि जैसे मुझी में शामिल हैं
मेरे दुःखों में
मेरी हर ख़ुशी में शामिल हैं
मैं चाहता हूँ कि वह भी
यूँ ही गुज़रती रहे
इसी तरह किसी लड़के को
प्यार करती रहे।