लास्ट बैंच

‘Last Bench’, a poem by Usha Dashora

कक्षा की लास्ट बैंच पर बैठने वाले
जिनके खीसों की मुठ्ठियों में भरी रहती हैं दुगनी आज़ादी

जो गले में बाँधे घूमते हैं
नालायक़ और डफ़र की तख़्ती

अक्सर वे गुम हुई तितलियों को ढूँढते हुए
ज्ञान की लालटेन में सेंध लगाना भी जानते हैं

यही तुम्हारी बनायी सीधी लकीर की बाँह मरोड़कर
चल पड़ते हैं
अपनी बनायी टेड़ी लाईन के सख़्त पंजों पर
क्योंकि वे केवल साँस लेने वाली भेड़ नहीं होना चाहते

यक़ीन करो
तुम्हारे फ़िक्स नियमों को डस्टर से मिटाने के बाद
और सारी होशियारी को ताला जड़ने के उपरान्त
इन्होंने ही की थी आग की खोज

जब तुम पढ़ा रहे थे भेड़ों को कोई बौद्धिक पाठ
तो ये चुपचाप तुम्हारे
‘यहाँ अक़्ल बँटती है’ वाले बैनर पर
काली स्याही पोतकर
चल पड़े थे पहिए का आविष्कार करने

एक सभ्य लाईन में खड़े होकर
जब तुम कर रहे थे पेड़ों को नंगा, वस्त्र की चाह में
सु-नागरिक शास्त्र के पर्चे बाँटते हुए
तब यही लास्ट बैंच वाले तुम्हारे ख़िलाफ़ जाकर
कपास के बीज बो रहे थे

तमीज़दार होने की बहस दरअसल अपने भीतर के जानवर को छिपाने की ज्ञानी कला है

इसी कला के बाहर कुछ लास्ट बैंचधारी
ख़ुद से खींची लाईन पर चलते-चलते
जुगनुओं के घर जा बैठे

और जंगलों के साथ करने लगे कविताई

यक़ीन करो
ये ही इतिहास के पहले कवि थे।

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