माँ का अस्तित्व

‘Maa Ka Astitva’, a poem by Raginee

माँ का अस्तित्व घर में
कभी-कभी होने
और
कभी-कभी न होने
जैसा है
क्योंकि
पिता जब भी चिल्लाते हैं
माँ होकर भी
कही नहीं दिखती
नहीं तो
हर तरफ़ दौड़ा करती माँ
नज़र का धुआँ उतारती
मन्नत का कपूर जलाती
प्रसाद का लडडू बाटती
नज़र का काला धागा बाँधती।

माँ का अस्तित्व घर में
कभी-कभी होने
और
कभी-कभी न होने जैसा है
माँ को बहुत दिनों से ख़बर आयी है कि
नानी माँ बीमार है
पर माँ को फ़ुर्सत नहीं
दादा की दवाओं से
दादी की कथाओं से
मेरी व बहन की दुविधाओं से
और पापा की अनवरत सुविधाओं से
माँ सब कुछ निपटाकर चुपचाप रो लेती है
नानी को याद कर
पर नहीं निकल पाती है माँ
अपने सुविधाओं के चक्रव्यूह से

माँ का अस्तित्व घर में होना
कभी-कभी होने
और
कभी-कभी न होने जैसा है।