माँ, मैं और मेरी बेटी

‘Maa, Main Aur Meri Beti’, a poem by Prita Arvind

माँ, तुमने तो
इन्कार ही कर दिया था
सही और ग़लत में
फ़र्क़ समझने से
बस करती रहीं
जब जो कहा गया
कभी पिता का फ़रमान
कभी पति का अनुरोध
तो कभी पुत्र मोह

बातें मैंने भी मानी
मानती हूँ
लेकिन फ़र्क़ समझकर
ग़लत को ग़लत कहकर
सही जवाब मुँह पर मारकर
कभी पिता की आँखों में आँख डालकर
कभी पति को उन्हीं की ज़बान में सुनाकर
कभी पुत्र के सामने टस से मस नहीं होकर
मुझे अफ़सोस है माँ
तुम्हारी अच्छी बेटी होने का

मेरी बेटी भी
मेरा कहा मानती है
लेकिन उसे बख़ूबी मालूम है
कि आज़ादी किश्तों में
मिलने वाली कोई वस्तु नहीं
हम उसे सम्पूर्णता में
लेकर पैदा हुए हैं
उसे किसी से छूट नहीं चाहिए
वो थोड़ी छूट दे देती है
कभी पिता, कभी भाई और
कभी बॉयफ़्रेंड को
अपने मामलों में दख़लअंदाज़ी का
फिर मेरी आँखों में देखकर मुस्कुराते
कर देती है सबको नज़रअंदाज़
और मुझे एक अच्छी माँ होने का
कभी अफ़सोस नहीं होता।

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