मंटो

मैंने कई बार माँगा ‘लाइसेंस’
अपनी कविताओं को टाँगा बना,
इस समाज में चलाने का।
चाहती थी भावनाओं को पहुँचाना
उनकी मंज़िल तक।
मगर मेरी अर्ज़ी ख़ारिज कर दी गयी।

मैंने विरोध ज़ाहिर करने के लिए
पहन ली काली समीज़,
मैचिंग ‘काली सलवार’,
मगर नहीं ओढ़ा कोई दुप्पटा।
उठा लिया मोर्चा मैंने
अकेले ही
भावनाओं को मंज़िल तक पहुँचाने का।

जुलूस जमता गया मेरे चारों ओर
मैं पढ़ती रही कविताएँ
‘दो क़ौमों’ की,
तवायफ़ों की
और सज्जनों की।
मुझसे पूछा गया
मेरे ‘सड़क के किनारे’ बैठने का सबब
और ये कि मैंने ‘बुरक़ा’ क्यों नहीं पहना
और ये भी कि ‘टोबा टेक सिंह’ कहाँ है!
‘ख़ुदा की क़सम’
मेरे पास जवाब में कहने को कुछ नहीं था,
लिखने को, बस कविता।

दिन सप्ताह बीतते चले गए,
मचलती ‘बारिश’, तड़कती धूप
में भी मैं बैठी रही,
और बैठी रही भीड़।
‘तमाशा’ ख़त्म करने को
फेंके गए ऊपर से कई फ़रमान
टूटी किसी की पिंडली, किसी की रीढ़।
मारे गए सारे ‘उल्लू के पट्ठे’।
मैं फिर भी बैठी रही
बाँचती रही कविताएँ।
दिन, सप्ताह, बरस
सड़ते समाज से आने लगी थी ‘बू’
किसी घाटन लौंडिया-सी।

फिर उतार दी गयी एक ‘गोली’
मेरे सीने में।
मेरा ‘ठंडा गोश्त’ छू कर वो समझे
कि हो गया है मेरी ‘बादशाहत का ख़ात्मा’।
मैंने ‘आँखें’ बन्द करते हुए
एक आख़िरी बार कहा
‘खोल दो’।

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