ग्रीष्म से आकुल सबसे ज़्यादा
मनुष्य ही रहा
ताप न झेला गया तो
पहले छाँव तलाशी
फिर पूरी जड़ से ही छाँव उखाड़ ली
विटप मौन में
अपनी हत्या के
मूक साक्षी बने रहे

शीत से व्यग्र सबसे ज़्यादा
मनुष्य ही रहा
ठिठुरन पीड़ापूर्ण लगी तो
पहले आग खोजी
फिर पूरी तत्परता से सब जलाकर ताप गया
जिन पशुओं के आलिंगन में रात बितायी
सुबह उनकी ही खाल उधेड़कर ओढ़ने लगा

चौमास से उद्विग्न सबसे ज़्यादा
मनुष्य ही रहा
जिन वृष्टियों पर नियंत्रण नहीं रहा
उन्हें नकार दिया
बाँध बनाए और धारें मोड़ीं

गड्ढे खोदकर उनमें सीमेंट भरनेवाला भी
मनुष्य ही रहा
और
मनुष्यता के चीथड़े उड़ानेवाला भी
मनुष्य ही

मनुष्य ने मनुष्य बनना ही सीखा
न कभी पेड़ बन पाया
न नदी
न मौसम
न पशु।

Previous articleअंतःकरण
Next articleसाहित्य सत्ता की ओर क्यों देखता है?
आदर्श भूषण
आदर्श भूषण दिल्ली यूनिवर्सिटी से गणित से एम. एस. सी. कर रहे हैं। कविताएँ लिखते हैं और हिन्दी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here