‘Marna’, a poem by Amar Dalpura

मैं चलना सीख रही थी
जैसे चाँद चलता है
बादल के साथ

मैं चलना चाहती थी तुम्हारे साथ
जैसे परछाई चलती है
ख़ुद के साथ

एक स्पर्श
कब मेरी देह से मर गया
जब ब्याह दी गयी अनचाहे लड़के साथ

अब एक बारिश
जो मेरी आँखों में है
जीवन भर साथ चलती है

और दुःख
इतने गहरे और लाल हो चुके हैं
अब इनसे रोटियाँ सेकती हूँ दिन-रात…

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