हथेलियों पर
बिखरा मेरी,
तुम्हारी हथेलियों
का स्पर्श,
हमारे बीच के
मौन का सम्वाद है

जैसे
गोधूलि और साँझ
के बीच
आकाश मौन होता है
प्रकृति का सम्वाद
मनुष्य से
उसके आध्यात्म के
अनन्त के पार
अपनी अप्रतिम गरिमा से
भावावेश में
स्थिर हो

मौन
अपेक्षा और यथार्थ
से बिलकुल परे
एक साधारण
स्थिर रूप ले लेता है
हमारी प्रतीतियों
के मध्य,
जिसका कलन
हम दो कलेवरों
के हृदय
में अंकित कई
स्मृतियों
से होकर गुज़रता हो

मानो इस ब्रह्माण्ड की
किसी पवित्र
आकाशगंगा में
कई सहस्राब्दियों बाद
एक ग्रह ने
जन्म लिया हो
इसी मौन में
और इन सारे
संयोगों का स्फुरण
साक्ष्य हो
हमारे मध्य के
मौन के सम्वाद का

प्रेम की
प्रासंगिकता
मौन के इसी
निरस्त्र स्वरूप
पर आधारित है
कि
मैं और तुम,
मौन के
इसी आध्यात्म के
दोनों ध्रुवों पर
जीवनपर्यन्त
स्थापित रहेंगे।