कौन हो तुम
और क्या हो
मेरी
जड़ हो
जल हो
गुल हो
फल हो
छाल तुम्हीं
तुम ही
जंगल हो
छाँव औ
आसरा
गाँव तुम्हीं
मैं
भटका
भूला
भूखा
बिसरा
भीत भिक्षु
बन बनवासी
तेरे गलियारों से
पगडण्डी मैं
चले चला
मेरा सिद्ध नाम
तुम अर्थ सभी
मिलना है अभी
अर करना सफ़र
हमें संग-संग
बन एक रंग
वो
लाल आसमाँ
नील ज़मीं
के बीच कहीं
है सत्य सभी
है ज्ञान का रंग
निर्वाण का रंग
मीरा के उस
भगवान का रंग
या ख़ुसरो के
मद गान का रंग
मुझे रंग रंग
मुझे रंग रंग
मुझे रंग रंग तुझ में
जाना है
तेरे अधरों का
सूहा बन के
तेरे नैनों का
सियाह बन के
धड़ धड़ धड़ धड़
धड़का बन के
रफ़्ता रफ़्ता
दम सा बन के
तेरे हाथों की
हरकत बन के
तेरे पैरों का
पैकर बन के
और नई रहना
फिर नई रहना
बस नई रहना
दूजा बन के…

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सहज अज़ीज़
नज़्मों, अफ़सानों, फ़िल्मों में सच को तलाशता बशर। कला से मुहब्बत करने वाला एक छोटा सा कलाकार।

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