मुझ पर गर्वित अहम्-भाव का शासन नहीं चलेगा
किन्तु स्वयं झुककर तुम मुझे झुका लो, जितना मन हो।

ऊँचे से ऊँचे पर्वत से ऊँचा मेरा माथा
पर घाटी के नम्र भाव को मैं निज शीश झुकाता
मैं कठोर हूँ पर ऐसा जैसा होता है हीरा
एक पाँखुरी से गुलाब की मैं घायल हो जाता।

मैं पतझरी निगाहों के सम्मुख निर्भीक खड़ा हूँ
किन्तु विनत उनके प्रति जिनकी पलकों में सावन हो।

बोले मुझसे स्वयं देवता— ‘अपना शीश झुकाओ,
पदरज धारण करो भाल पर, मनचाहा वर पाओ।’
मैंने कहा कि मैं जड़ता के सम्मुख नहीं झुकूँगा
रूप त्याग पत्थर का पहले तुम निर्झर बन जाओ।

मैं बेमोल बिकूँगा केवल उस निर्धन के हाथों
जिसके कर में किसी पराई पीड़ा का कंचन हो।

मुक्तामाल नहीं लाया मैं, थोड़ा-सा चन्दन है
भेंट चढ़ाने को पूजा के सुमन नहीं हैं, मन है
सच है मैं अविनयी और अविनम्र रहा जीवन-भर
मेरे पास नहीं है श्रद्धा, मात्र प्यार का धन है।

सोना जड़े बन्द द्वारों पर थाप नहीं दूँगा मैं
वहाँ रहूँगा खुला सभी के लिए कि जो आँगन हो।

मुझ पर गर्वित अहम्-भाव का शासन नहीं चलेगा
किन्तु स्वयं झुककर तुम मुझे झुका लो, जितना मन हो।

बालस्वरूप राही की ग़ज़ल 'किस महूरत में दिन निकलता है'

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