सर पर मटका रख
पानी भरने जाती लड़कियाँ
अब ख़ूबसूरत नहीं लगती।
चलते हुए,
कभी लचकती उनकी कमर
अब किसी
सूखी नदी की
दरार खायी
बस एक पगडण्डी रह गई है।
एक तालाब के सूखते पानी
के साथ-साथ सूख गई है
उनकी आँखों की चंचलता।

उस तालाब के सूखने से जैसे
तड़प कर मर गई थीं उसकी मछलियाँ,
ठीक वैसे ही तड़प कर मर गई है
उनके चेहरे की मुस्कान।
अब तालाब की सतह पर
जगह-जगह चिपके
पॉलीथीन के टुकड़े
उनके पैरों के
छालों से नजर आने लगे हैं।

इन लड़कियों ने
अपनी आँखों के नीचे
गहरे कुँए खोद लिए हैं
और खोदती ही जा रही हैं,
मगर पानी का कोई नाम-ओ-निशान
नज़र नहीं आता।
वो कब से बस खोज रही हैं
सिर्फ़ एक बूँद पानी
जिसे आँखों में डालकर
उसे आँसू समझ सकें,
और रो सकें इस बात पर
कि सब कुछ मर जाने के बाद
जो ज़िंदा रह जाता है,
उसे ज़िंदा रखने की कोशिश
कोई नहीं करता।

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सुप्रिया मिश्रा
हिन्दी में कविताएं लिखती हूँ। दिल से एक कलाकार हूँ, साहित्य और कला के क्षेत्र में नया सीखने और जानने की जागरूकता बनाए हुए हूँ।

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