‘Mukhagni’, a poem by Preeti Karn

औंधे मुँह पड़ी लड़की
प्रेम की उसाँसें ही नहीं ले रही होती
पीड़ा के अजन्मे बीज को
मन की आँच से सुखाने के
असंख्य स्वांग भी रचती है।

वयस्क जड़ों की पीड़ा
कभी महसूस करने की ज़रूरत नहीं होती
मिट्टी को अनुकूल करते
बरसों बरस बीते
पुनर्वास का दंश झेलती जड़ें
हज़ार कोशिशें करती हैं
आत्मा को जीवित रखने की,
मुरझाए हुए पुष्प विहीन तरु
आँगन की शोभा नहीं बढ़ाते
मनहूस खड़े रहते हैं
अर्द्धजीवित…

अभाव ग्रस्त जीवन के घुप्प अँधेरों में
बेटे नामक दुरुह यंत्र से
भविष्य की दीवार में कर लेती हैं
रौशनी का सुराख़
और बेटियों के हिस्से की
पोषण असमानता का तमग़ा पहनकर
काटने लगती हैं अपने कलेजे….!

कुण्ठा का घूँट पीती
अपनी मुखाग्नि का कर लेती हैं
असमय इंतज़ाम!
सर्वस्व हारकर सीखना होता है
बेटे बेटियों में करना फ़र्क़।

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प्रीति कर्ण
कविताएँ नहीं लिखती कलात्मकता से जीवन में रचे बसे रंग उकेर लेती हूं भाव तूलिका से। कुछ प्रकृति के मोहपाश की अभिव्यंजनाएं।

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