नाक़ाबिल प्रेमी

‘Naqaabil Premi’, a poem by Manjula Bist

मौजूदा दौर में
जब सुबह घर से निकले लोगों का
शाम को सकुशल लौट आना
सर्वाधिक संदिग्ध होता जा रहा है!

प्रेम ही है
जो हर सदी के यथार्थ को संत्रास बनने से रोक सकता है!

और
हमारे दौर का सबसे शर्मनाक पहलू यह भी है कि
हम इस अर्थ में पूर्ण-शिक्षित तो हो चुके हैं कि
जंगल में सर्वाधिक क़ाबिल ही ज़िन्दा बचा रहेगा..

लेकिन फिर भी
हम अब तक
प्रेम में इतने नाक़ाबिल क्यों साबित होते जा रहे हैं!