कैसे मालूम कि जो नहीं रहा
उसकी मौत नींद में हुई?

कह दिया जाता है
कि वह सोते हुए शान्ति से चला गया
क्या सबूत है?
क्या कोई था उसके पास उस वक़्त
जो उसकी हर साँस पर नज़र रखे हुए था?

कौन कह सकता है कि अपने जाने के उस क्षण
वह जागा हुआ नहीं था
फिर भी उसने आँखें बन्द रखना ही बेहतर समझा
अब वह और क्या देखना चाहता था?
उसने सोचा होगा कि किसी को आवाज़ देकर
या कुछ कहकर भी अब क्या होगा?
या उसके आसपास कोई नहीं था
शायद उसने उठने की फिर कोशिश की
या वह कुछ बोला
उसने कोई नाम लिया

मुझे कभी-कभी ऐसा लगा है
कि जिन्हें नींद में गुज़र जाने वाला बताया जाता है
उसके बाद भी एक कोशिश करते होंगे
उठने की
एक बार और तैयार होने की
लेकिन उसे कोई देख नहीं पाता है

पता नहीं मुझे ऐसा शक क्यों है
कि कम से कम यदि मेरे साथ ऐसा हुआ
तो मैंने वैसी एक आख़िरी कोशिश ज़रूर की होगी
जब साँस रुक जाने के बाद भी
नाख़ून कुछ देर तक बढ़ते रहते हैं
तो वैसा भी क्यों मुमकिन नहीं होता होगा?
क्या जो चीज़ें देखी नहीं जातीं
वे होती ही नहीं?

लिहाज़ा मैं सुझाव देना चाहता हूँ
कि अगली बार अगर ऐसा कुछ हो
कि कहना पड़े कोई सोते-सोते नहीं रहा
तो यह कहा जाए
कि पता नहीं चला वह कैसे गुज़रा
जब वह नहीं रहा होगा
तब हम सब नींद में थे
क्या मालूम शायद वह ज़्यादा सही हो?

Book by Vishnu Khare:

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विष्णु खरे
विष्णु खरे (२ फरवरी १९४० – १९ सितम्बर २०१०) एक भारतीय कवि, अनुवादक, साहित्यकार तथा फ़िल्म समीक्षक, पत्रकार व पटकथा लेखक थे। वे हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखते थे। वे अंग्रेजी साहित्य को विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाते थे। उन्होंने साहित्य अकादमी में कार्यक्रम सचिव का भी पद सम्भाल चुके हैं तथा वे हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स के लखनऊ, जयपुर तथा नई दिल्ली में सम्पादक भी रह चुके थे।

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