“जिस क्षण आप इंतज़ार करना छोड़ देते हैं, उस क्षण आप जीना भी छोड़ देते हैं।”

 

“तुम मदद कर सकते हो, लेकिन उतनी नहीं जितनी दूसरों को ज़रूरत है और यदि ज़रूरत के मुताबिक़ मदद नहीं कर सको तो चाहे कितनी भी मदद क्यों न करो, उससे बनता कुछ भी नहीं।”

 

“नहीं, सुख होता नहीं, सिर्फ़ याद किया जा सकता है.. अपनी यातना में..।”

 

“जिन लोगों के सामने दूसरा रास्ता खुला रहता है, वे शायद ज़्यादा सुखी नहीं हो पाते।”

 

“तुम बहुत से दरवाज़ों को खटखटाते हो, खोलते हो और उनके परे कुछ नहीं होता, फिर अकस्मात् कोई तुम्हारा हाथ खींच लेता है, उस दरवाज़े के भीतर जिसे तुमने खटखटाया नहीं था। वह तुम्हें पकड़ लेता है और तुम उसे छोड़ नहीं सकते।”

 

“हमारा बड़प्पन सब कोई देखते हैं, हमारी शर्म केवल हम देख पाते हैं।”

 

“अब वैसा दर्द नहीं होता, सिर्फ़ उसको याद करती है, जो पहले कभी होता था – तब उसे अपने पर ग्लानि होती है। वह फिर जान-बूझकर उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है, ख़ुद-ब-ख़ुद उसकी कोशिशों के बावजूद भरता जा रहा है।”

 

“कुछ लोग शायद ऐसे ही होते हैं… उन्हें देखकर अपना किया-गुज़रा सबकुछ बंजर-सा जान पड़ता है।”

 

“कभी-कभी मैं यह सोचता हूँ कि जिसे हम अपनी ज़िन्दगी, अपना विगत, अपना अतीत कहते हैं, वो चाहे कितना भी यातनापूर्ण क्यों न रहा हो, उससे हमें शांति मिलती है। वह चाहे कितना ऊबड़खाबड़ क्यों न रहा हो, हम उसमें एक संगति देखते हैं।”

 

“कुछ ऐसी यन्त्रणाएँ हैं जिनके व्याकरण को केवल वे समझ सकते हैं जो उन्हें भुगतते हैं, दूसरों के लिए वह अज्ञात लिपि है।”

 

“अक्सर कहा जाता है कि हर आदमी अकेले मरता है। मैं यह नहीं मानती। वह उन सब लोगों के साथ मरता है, जो उसके भीतर थे, जिनसे वह लड़ता था या प्रेम करता था। वह अपने भीतर पूरी एक दुनिया लेकर जाता है। इसीलिए हमें दूसरों के मरने पर जो दुःख होता है, वह थोड़ा-बहुत स्वार्थी क़िस्म का दुःख है, क्योंकि हमें लगता है कि इसके साथ हमारा एक हिस्सा भी हमेशा के लिए ख़त्म हो गया है।”

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निर्मल वर्मा
निर्मल वर्मा (३ अप्रैल १९२९- २५ अक्तूबर २००५) हिन्दी के आधुनिक कथाकारों में एक मूर्धन्य कथाकार और पत्रकार थे। शिमला में जन्मे निर्मल वर्मा को मूर्तिदेवी पुरस्कार (१९९५), साहित्य अकादमी पुरस्कार (१९८५) उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। परिंदे (१९५८) से प्रसिद्धि पाने वाले निर्मल वर्मा की कहानियां अभिव्यक्ति और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ समझी जाती हैं।

3 COMMENTS

  1. निर्मल वर्मा को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि एक गहरी पहाड़ी खामोशी के बीच बहते जा रहे है।यह बहाव ही हमारे अस्तित्व को बहुत कुछ कुरेदता है तब यह एहसास होता है कि अब हम वह नहीं रहे जो बहाव के पहले थे।

  2. अब वैसा दर्द नही होता…… वाह!! कितनी सामान्य मगर गहरी बातें!! कमाल हैं निर्मल साहब. बिल्कुल अपने नाम की तरह निर्मल….

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