पहाड़ों पर जमी बर्फ़ तप रही है

‘Pahadon Par Jami Barf Tap Rahi Hai’, a nazm by Usama Hameed

जब ठण्ड बढ़ती है
पहाड़ों पर बर्फ़ गिरती है,
मुसल्ले और टोपियाँ बर्फ़ सी
नमाज़ियों के साथ ऐंठ जाती हैं
बारूद की ख़ुशबू सूखी हवा में
हर जगह मौजूद मिलती है,
ख़ून में दहशत ऐसी रवाँ
कि गोलियों की आवाज़
माँ के पेट में सुनायी देती है,
लहू बहता हुआ बर्फ़ में
बैठ जाता है, बर्फ़
धधक उठती है,
लाल-लाल घाटियाँ खिल जाती हैं!
और आकाश में बादलों के झुण्ड
गीत गाते हैं-
“फ़ना की कोई दुआ आज मक़बूल नहीं है”
अनसुने नारे उबल पड़ते हैं
भेड़िये हर तरफ़ लाशों पर
विजय के नृत्य करते हैं और
बर्फ़ गिरती रहती है…

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