किसी परिंदे की रात पेड़ पर फड़फड़ाती है
रात, पेड़ और परिंदा
अँधेरे के ये तीनों राही
एक सीध में आ खड़े होते हैं
रात अँधेरे में फँस जाती है
रात तू ने मेरी छाँव क्या की
जंगल छोटा है
इसलिए तुम्हें गहरी लग रही हूँ
गहरा तो मैं परिंदे के सो जाने से हुआ था
मैं रोज़ परिंदे को दिलासा देने के बाद
अपनी कमान की तरफ़ लौट जाती हूँ
तेरी कमान क्या सुब्ह है
मैं जब मरी तो मेरा नाम रात रख दिया गया
अब मेरा नाम फ़ासला है
तेरा दूसरा जन्म कब होगा
जब ये परिंदा बेदार होगा
परिंदे का चहचहाना ही मेरा जन्मदिन है
फ़ासला और पेड़ हाथ मिलाते हैं
और परिंदे की आँख खुल जाती है…

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सारा शगुफ़्ता
(31 अक्टूबर 1954 - 4 जून 1984) सारा शगुफ़्ता पाकिस्तान की एक बनेज़ीर शायरा थीं। 1980 में जब वह पहली और आख़िरी बार भारत आयी थीं तो दिल्ली के अदबी हल्क़ों में उनकी आमद से काफ़ी हलचल मच गयी थी। वह आम औरतों की तरह की औरत नहीं थीं। दिल्ली के कॉफी हाउस मोहनसिंह प्लेस में मर्दों के बीच बैठकर वह विभिन्न विषयों पर बहस करती थीं। बात-बात पर क़हक़हे लगाती थीं। पर्दे की सख़्त मुख़ालिफ़त करती थीं और नारी स्वतन्त्रता के लिए आवाज़ बुलन्द करती थीं। यही नहीं वह आम शायरात की तरह शायरी भी नहीं करती थीं। ग़ज़लें लिखना और सुनना उन्हें बिल्कुल पसन्द न था। छन्द और लयवाली नज़्मों से भी उन्हें कोई लगाव नहीं था। वह उर्दू की पहली ‘ऐंग्री यंग पोएट्स’ थीं और ऐंगरनैस उनकी कविता की पहली और आख़िरी पहचान कही जा सकती है।