पिशाच

‘Pishaach’, a story by Shivam Giri

रात के बारह बजने को आए हैं। आनंद खेत से लौट रहा था। गले में गमछा डाले, कांधे पर फावड़ा और वही उसकी पसंदीदा नीले रंग की कमीज़ और ढीली पतलून। इक्कीस वर्ष की आयु में क्या हट्टाकट्टा शरीर और अत्यंत बुद्धिमान और पूरे गाँव में विख्यात।

पिता मोरारी लाल खेत पर ही मेढ़ बांध रहे थे और उसे घर भेज दिया था। मस्त मगन चला आ रहा था कि एक काली परछाई ने रास्ता रोका।

“अरे आनंद! तुम हो क्या?” आवाज़ जानी पहचानी थी!

“हाँ! चाचा मैं ही हूँ!” आनंद ने कहा।

“इतनी रात गए क्या कर रहे हो?”

“पिताजी खेत पर मेढ़ बांध रहे हैं, मुझे घर भेज दिया, रघुवीर का इंजन लगा है, कल देना है! इसलिए रात में खेत भर रहे हैं।” आनंद ने समझाते हुए कहा।

“वो सब ठीक है पर इतनी रात गए घूमना फिरना बंद कर दो, पता नहीं है तुम्हे गाँव में पिशाच घुस आए हैं?” दबी आवाज़ में हरिया चाचा बोले।

“अरे चाचा! तुम भी किन बातों पर विश्वास करने लगे हो, ये पिशाच-विशाच कुछ नहीं, ख़ाली गप्प बातें है, ध्यान ना दिया करो।” आनंद हंसते हुए बोला।

चाचा कुछ न बोले और लाठी टेकते हुए वहां से चल दिए, आनंद भी घर की तरफ़ चल दिया।

घर पर आनंद की बहन रेणु सो चुकी थी, माँ (सुगंधा) अभी जाग रही थी।

“अरे आनंद! खेत भरा नहीं क्या?” माँ ने पूछा।

“अम्मा! तीन किरैय्यां रह गयी है बस, एक-दो घंटा शायद और लगे, पिताजी बोले तुम घर जाओ तो मैं आ गया।”, आनंद ने जवाब दिया।

“सही किया, तेरी खटिया आंगन में बिछी है , कहे तो मच्छरदानी लगा दूँ?”, माँ ने कहा।

आनंद ने कहा, “रहने दो अम्मा, आज हवा चल रही है, मच्छर नही लगेंगे।”

“अम्मा, आज हरिया चाचा कुछ बकवास कर गये मुझसे।” आनंद ने कहा।

“कैसी बकवास?” माँ ने पूछा।

“अरे, गाँव के लोगों ने उन्हें पढ़ा दिया होगा कि गाँव में पिशाच घुस आए हैं, तो वही कह रहे थे कि रात में मत घूमा करो और न जाने क्या क्या! सच पूछो तो उनकी भी अब उमर हो गयी है।” आनंद ने जवाब दिया।

“धत!! ऐसे नहीं बोलते, बड़े-बूढ़ों की बातों का मज़ाक नही उड़ाते।”, माँ ने डाँटते हुए कहा।

अगली सुबह, रोज़ की तरह बरगद के नीचे चौपाल लगी थी, बच्चे मिट्टी में खेल रहे थे और बूढ़े लोग अपने हुक्का-बीड़ी में व्यस्त थे। आनंद भी वहां आकर बैठ गए छाव में, तभी रामनारायण पंडित जी ने पिशाच की बात उछाल दी कि उसके ‘ऐसे दांत होंगे , मोटी चमड़ी होगी, ख़ून का प्यासा होगा और न जाने क्या क्या बक दिए।”

तभी रघुवीर ठाकुर जी ने चुप करते हुए कहा, “पंडित जी, कबहुँ-कबहुँ चुप भी रह लिया करो, ये फालतू पंचायत यहां न करो, बालक बच्चे बैठे है डर-डरा जाएँ।”

तभी मुंगेरी लाल हुक्का सुलगाते हुए बोले, “अरे, रहने दो ठाकुर, इनका मुंह बंद कराए से कोई लाभ नहीं, गाँव भर में पिशाच की ही चर्चा हो रही है।”

आनंद से चुप ना रहा गया और समझाते हुए बोला, “क्या पिशाच पिशाच लगा रखा है, किसी ने देखा है क्या? बताइये किसका ख़ून पी गया? खाली-मूली में हउआ बना रखा है।”

उधर से ठकुराइन की आवाज़ आयी, “अजी सुनते हो!?”

ठाकुर साहब मुस्कुराते हुए बोले, “लो आ गयी पिशाच!”

सब हँसने लगते हैं कि तभी रेणु दौड़ी-दौड़ी आती है, “भैया जल्दी चलो, पिताजी को न जाने क्या हो गया है!”

आनंद घबरा गया और हड़बड़ाते हुए घर की ओर दौड़ा। और भी कई लोग उसके साथ गए।

घर पर पिताजी बेहोश पड़े हुए थे, तभी पीछे से पंडित जी बोले, “हो न हो भाइयो ये पिशाच का ही प्रकोप है।”

सबने हामी भारी।

सुगंधा पानी लेकर आयी, और कुछ छींटें चेहरे पर मारी तो मोरारी ने हल्की हल्की आँखें खोलीं और देखा सब उसे घेर कर खड़े हुए थे।

“बापू हुआ क्या?”, आनंद ने पूछा।

मोरारी, आँखों को मसलते हुए बोला, “पता नहीं बेटा, अचानक एक हवा सी लगी और सिर चकरा गया।”

अब जैसे पेट्रोल में तीली सी लग गयी हो, पूरे गाँव में ये बात फैल गयी कि फलाने मोरारी पर पिशाच ने हमला कर दिया। होना क्या था, गाँव भर के पंडितों की चांदी हो गयी, जगह-जगह हवन कुंड सज गए और भरी दुपहरी में मंतर-तंतर शुरू हो गया। मारे पिशाच के डर के औरतों ने बाहर निकलना बंद कर दिया, बच्चे जो गलियों में शोर तमाशा करते थे सब ऐसे ग़ायब हो गये जैसे गधे के सर से सींघ।

ये बात और है कि किसी ने पिशाच तो क्या पिशाच की पूँछ तक नहीं देखी थी पर जो भय का पिशाच सब के मन में बैठा था असली डर तो उसका था।
और ऐसे हाल में अगर किसी को चींटी तक काट जाती थी तो लोग अफ़वाह फैला देते थे कि फलाने को पिशाच ने घेर लिया।

लेकिन ये भरम तब तक नहीं टूटा जब तक पंडितों ने पूजा के नाम पर पूँजी ना इकट्ठी कर ली। एक दिन ख़बर चला दी कि आन गाँव के महापंडित ने महायज्ञ किया और ये पिशाच वाली महाबला टल गयी।

और ये अफ़वाह हमारे आंनद ने फैलायी थी, जैसे लोहे को लोहा काटता है वैसे ही अफ़वाह को अफ़वाह, क्योंकि न किसी ने पिशाच देखा और न ही वो महापंडित।