आराधना जोशी की कविताएँ

Poems: Aaradhana Joshi

वो दोस्त है उसका

दिन के उजाले अब उसे नहीं भाते
वो प्रतीक्षा करती है सूरज के डूबने का
दिनभर मन कुमलाया सा रहता है
ईश्वर की आराधना का समय प्रारम्भ हो रहा है
घर के आस-पास से
घण्टियों की ध्वनी, धूप-दीप और
लोबान के प्रज्ज्वलित होने की महक आ रही है
मन के विचारों की मंथन नदी
धीमी गति पकड़ चुकी…
रात्रि का प्रथम पहर शुरू हो चला
मन की रात रानी महकने को है
उन दोनों के मन का मौसम बदलेगा
दूर कहीं… वो शख़्स तकिये पर लेटे हुऐ
सिगरेट के छल्ले बनाते हुए
वो सारी उलझनों को सुलझा देगा
दो मन… कुछ क्षणों में एक होंगे
कमरे में अनगिनत प्रेम के जुगनुओं की चमक होगी
दोनों के बीच नयी उम्मीदों के चिराग़ जलेंगे
धीरे-धीरे आधी रात तक सब ठीक हो जाएगा
वो दोस्त है उसका…
वो उस लड़की के सारे बिखरे ख़्वाब समेट देगा
वो एक रात में अनगिनत रूप बदलकर
उसके जीवन में हर रंग भर देगा…
वो उसकी हर बात समझ लेगा
जीवन की हर करवट में वो उसके साथ होगा
वो दोनों एक ही रात में जी लेंगे
न जाने कितनी ही रातें…
क्योंकि ऐसे मन भावन क्षणों के संयोग
उन्हें जीवन में कम ही मिलते हैं, जहाँ वो दोनों
एक-दूसरे के पास बैठकर ख़ुद को टटोलते हैं
और फिर हँसते हुए अपने ही भीतर
एक दूसरे को पा लेते हैं…

हम दोनों का रिश्ता

धरा के इस छोर से क्षितिज
के उस पार तक
सृष्टि का हर सृजन बेहतरीन है
सूरज, चाँद, सितारे, नदियों की कलकल
चाँदी-सी चमकती हिमालय की पर्वत मालाएँ
झरनों से निकला संगीत…
उन्मुक्त उड़ते पंछियों की लम्बी कतारें
आसमान में उभरा इंद्रधनुष
रंग बिरंगी फूलों से परिपूर्ण घाटियाँ
कान्हा की बाँसुरी से निकले सुरीले स्वर
और भी कितना… असंख्य
कुछ अवर्णनीय, अकल्पनीय बेहतरीन सृजन है
लेकिन
तुमसे मिलने से पहले और तुमसे बिछड़ने के बाद
मेरे लिये इस सृष्टि में न पहले
कुछ बेहतरीन था
और न बाद में कुछ बेहतरीन होगा
मेरे लिये सिर्फ़
हम दोनों का रिश्ता
इस सृष्टि का सबसे बेहतरीन सृजन है

कहो कल्पना कैसी हो

कहो कल्पना कैसी हो
जानता हूँ
मुझसे शिकायतें हैं, कहोगी कैसे हो
जानता हूँ, मैं बुरा हूँ
लेकिन तुम्हें सहेजकर रखना होगा मुझे
वो मौन होकर देखती रही
कहो कल्पना
कैसी-कैसी पीड़ाओं को सहेज लिया है
वो बोली
पर्वत सी अटल है कुछ, सागर सी गहरी है कुछ पीड़ा
अम्बर सी नीली विस्तृत है कुछ, भूमि से भी भारी है कुछ पीड़ा
सोचती हूँ… कैसे अंत होगा
तुम ही बताओ
उसने कहा होगा…. कभी अंत भी होगा
वो बोली कैसे
उसने अपने हाथों में
उसके चेहरे को भरते हुए कहा…
बहने दो इन पीड़ाओं को मेरी हथेलियों पर
उसकी गर्म हथेलियों का स्पर्श मिलते ही
वो कुछ पीड़ाओं से रिक्त हो उठी
और अब उसकी हथेलियाँ मोतियों से भर गयीं
कुछ पीड़ाओं का अनुपात कम हुआ
उषा की प्रथम बेला ने गोधूलि की चुनरियाँ ओढ़ लीं
एक लम्बे अंतराल के बाद
एक छोटा सा सुखद दिन
उन दोनों को नसीब हुआ…

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