केशव शरण की कविताएँ

Poems: Keshav Sharan

विशिष्ट और श्रेष्ठ

बूँद कमल की पंखुरी पर है
इसलिए क्या वह श्रेष्ठ है
उस पानी से
जिसमें खिला है कमल-पुष्प?

कण देव के पदरज का है
इसलिए क्या वह श्रेष्ठ है
उस धूलि से
जिसमें लोट रहे हैं भक्त?

क्या वैसा दुनिया भी माने
जैसा विशिष्ट बूँद मानती है
और जैसा विशिष्ट कण भी जाने?

मौसम के विरुद्ध

छाता हाथ में उठाकर चलना ही होगा
नाक पर धूपी चश्मे का बोझ
सहना ही होगा

इतना करना ही होगा
मौसम की मार से
बचने के लिए

मौसम के विरुद्ध
मौसम रचने के लिए
तब फिर मत सोचो
उसके लिए बहुत परेशान होना पड़ेगा
माली और किसान होना पड़ेगा

दुःख के कारण

मैं भी जानता हूँ
दुःख आता है
और जाता है

मैं भी मानता हूँ
दुःख से घबराना नहीं चाहिए
दुःख का सामना करना चाहिए

सामना तो करना ही है
दुःख का
क्योंकि हालात और बिगड़ते ही हैं
पलायन से

मगर लरजता है दिल
इस बात से कि
दुःख के कारण
लज्जित होना पड़ता है
समाज में
और गुज़रना पड़ता है
अकेलेपन से
जो!

नदी और समुन्दर

नदी समुन्दर में
समा नहीं जाती
यद्यपि समाती रहती है
हर समय
समुन्दर में

समाते हुए भी
जो नहीं समाती है
वही नदी
कही जाती है
वसुंधरा पर

समोते-समोते
जो कभी समो न पाये
उसे समुन्दर
कहा जाये

पाटलिपुत्र में हालिया बरसात

कथाओं में मिलती थी मात्र
ऐसी बरसात
कृष्ण की जन्म-कथा में
मनु की सृष्टि-कथा में
तुलसीदास की प्रेम-कथा में
सो, स्तम्भित है पाटलिपुत्र का आधुनिक कथा-लेखक
और उसके कथा-पात्र
देखकर ऐसी बरसात
जिसमें डूब गया है समस्त कथा-परिवेश
और सबसे बड़ी बात
कि बह गयी है कथा-लेखक की
कथा लिखने की मेज…

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