आपदकाल में

कहीं पहुँचने का रास्ता
इतना भी पथरीला नहीं होता
जितनी भारी होती है मन की गठरी

बिवाइयों भरे पाँव से दिल नहीं दुखता
दुखता है भितरघात से

प्रेम के बदले जो प्रेम न दे सके
वो कैसा मानुष बन्धु

आपदकाल में अपनी बुद्धि से ज़्यादा भीतर के भय को चुनना
वही बचाएगा अकाल मृत्यु से

डायनासोर नहीं बचे
जो समझते रहे सर्वश्रेष्ठ, सबसे उत्कृष्ट

बचते रहें है तिलचट्टे लाखों वर्ष से
जिन्हें समझा जाता रहा निकृष्ट

काल का बाण

ज़मीन से जुड़ा हर आदमी
आज पुरानी दीवारों की मानिन्द चटकने लगा है
मगर चटचट-सी कोई आवाज़ नहीं होती,
ख़ामोशी के शामियाने के नीचे
हो रहा ये षड्यन्त्र
काल का छोड़ा गया कोई बाण है?
जो सबको बींधता ही जा रहा है!

शायद कोई बच नहीं पाए
चूँकि निशाना है अचूक
मगर कैसे मान लें हम कि हमारी ज़िन्दगी की यह अन्तिम शाम है!

हमारे मस्तिक पर तो किसी का वश नहीं है
अतः आस्था के विशाल सागर में गोते लगाना होगा
कि सूरज अपनी रौशनी के साथ
एक दिन अवश्य उदित होगा
जो काल के इस षड्यन्त्र को जलाकर राख कर दे
और हम अपनी ग़लतियों को ठीक कर
फिर से अपनी ज़िन्दगी जी सकें!

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महिमा श्री
रिसर्च स्कॉलर, गेस्ट फैकल्टी- मास कॉम्युनिकेशन , कॉलेज ऑफ कॉमर्स, पटना स्वतंत्र पत्रकारिता व लेखन कविता,गज़ल, लधुकथा, समीक्षा, आलेख प्रकाशन- प्रथम कविता संग्रह- अकुलाहटें मेरे मन की, 2015, अंजुमन प्रकाशन, कई सांझा संकलनों में कविता, गज़ल और लधुकथा शामिल युद्धरत आदमी, द कोर , सदानीरा त्रैमासिक, आधुनिक साहित्य, विश्वगाथा, अटूट बंधन, सप्तपर्णी, सुसंभाव्य, किस्सा-कोताह, खुशबु मेरे देश की, अटूट बंधन, नेशनल दुनिया, हिंदुस्तान, निर्झर टाइम्स आदि पत्र- पत्रिकाओं में, बिजुका ब्लॉग, पुरवाई, ओपनबुक्स ऑनलाइन, लधुकथा डॉट कॉम , शब्दव्यंजना आदि में कविताएं प्रकाशित .अहा जिंदगी (साप्ताहिक), आधी आबादी( हिंदी मासिक पत्रिका) में आलेख प्रकाशित .पटना के स्थानीय यू ट्यूब चैनैल TheFullVolume.com के लिए बिहार के गणमान्य साहित्यकारों का साक्षात्कार

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