Poems: Preeti Karn

प्रेम

यह जो लिखे हुए शब्दों की कारीगरी है
जिन्हें मान लेते हैं सब
प्रेम की परिभाषाएँ
क़तई सच नहीं हैं।

वो जो लिख-लिखकर
मिटाए गए हैं,
रद्दी के ढेर में
मुड़े-तुड़े बेबस पड़े हैं,
खुरच-खुरचकर
जिसकी तासीर बेअसर की है,
आधे-अधूरे हर्फ़ की
अंदाज़ बयानगी है
वही प्रेम है।

दृष्टिकोण

दृष्टिकोण और दायरे
दोनों ही बदले हैं मैंने
जिनके लिए बदलाव की
सीमाएँ तय हैं
धुँधले होने की अवस्था में
कोण बदलती हूँ
दूरियों को मिटाने में
माप लेती हूँ
चंद क़दमों के अथक प्रयास
अँधेरों से संघर्ष करने में
जलाती हूँ अनगिन दीप
हवाएँ झकझोरती हैं जब
अपनी ही पीठ की
ढाल से बचा लेती हूँ
थरथराती लौ…
मैं हर प्रयास से
जीत कर संघर्ष
हार गई हूँ…
तुम्हारे दृष्टिकोण से!

भाव की व्यंजना

कब जली हूँ बता वेदना के लिए…

फूल भी झड़ गये संग परिहार के
गीत मिटने लगे प्रीत मनुहार के
घूँट मन ने उमर भर लहू के पिए
कब जली हूँ…

दिन ढला साँझ भी डूबने को चली
रात के भी हृदय में मची खलबली
मूक-सी कल्पना घूँट कितना पिए
कब जली हूँ…

गीत में प्रीत की सब घुली रागिनी
साँस के तार गिनती विरह यामिनी
भाव की शृंखला एक जीवन जिए
कब जली हूँ…

एक अरसे निभाते रहे रात दिन
मौन की साधना हर घड़ी प्रीत बिन
व्यर्थ जलते रहे आस के नित दिए
कब जली हूँ…

ये समर्पण वृथा अनवरत चल रहा
भान होता नहीं नित्य मन जल रहा
प्रेम पलता रहा मुस्कुराहट लिए
कब जली हूँ…