समय असमय के केन्द्र

समय कब ठहरा
उन्मादित अवसादित क्षणिकाएँ
प्रतिस्पर्धा की सीमाएँ लाँघती
सन्दर्भों के भँवर जाल में
उलझी-सुलझी
व्यतिक्रम की प्रतीक्षा में
लगी रहीं।

समय पर समय का लौटना
जब नहीं होता
असमय किए प्रयास और परिश्रम
निरर्थक ढेर हो जाते हैं
निर्जन में पड़े पाषाण टीलों की भाँति।

तुम्हें बरसना था उस वक़्त
जब सूख रही थी धरती और
बंजर पड़े थे मन।
तुम्हें लौटना था
जब नहीं उगे थे पत्ते
उभरी शिराओं वाले वृक्ष के,
आहत शिथिल थे मन।

अब सब भरे हैं
और तुम एक बार फिर
अपनी समय-सीमा भूलकर
असमय बरसने की प्रतिबद्धता पर
अड़े हो।
ऐसे में हानि की सम्भावनाएँ
कैसे नहीं दिखायी देतीं
कितने निष्ठुर हो तुम!

मौन

कविताओं को सौंपती रही
अपने कोलाहल,
कविता अनन्तकाल तक
कितने घूँट भरती!
आख़िर चुप्पियों को
देकर कठोर अज्ञातवास
बोलने के प्रयास में जुटी हैं…
मैं अपने आसपास की
प्रतिध्वनित तरंगें सुनती हूँ…
मुझे नदी की लहरों में सुनायी देती है
मद्धिम-मद्धिम स्वरलहरियाँ।
मृदुल सुगन्धा उन्मत्त होकर भी
आश्वस्ति में डोलती हैं पातपात
महक मोह की धुन
सब कविताओं के आधीन
मेरे पास बस एक
मौन है!

अग्नि पुष्प

अन्तःकरण की प्रसुप्त बेसुध
पीड़ा के
कानों में पड़ गयी है
कोई जाग्रत ध्वनि…
किसी हलचल से चेतना का
पुनर्जीवित होना असम्भव नहीं!

बन्द पड़े कमरे की
जर्जर दीवारें और झरोखों
के बीच
पूर्ण कर चुके
अज्ञातवास के प्रति
रोष नहीं, बल्कि
आभार प्रकट कर
पुनः एक नयी यात्रा की
बनाने लगे हैं अल्पकालिक योजनाएँ।

शीत अपने चरमोत्कर्ष पर
ठहराव की अधिक सम्भावनाएँ
नहीं तलाशता।
अतिवादिता से उपजे
प्रश्नों के उत्तर निष्पादन
की प्रक्रिया में,
पलाश फिर एक बार
वीरानगी को करते हैं आबाद।
जंगल के वीतरागी मन को
सुना रहा बसन्त
मोहपाश की अभिव्यंजना का
सुन्दरतम राग।

ये बनफूल हैं या
जंगल के बैरागी मन की
धधकती आग…
फिर विहंसे अग्नि पुष्प!

सांध्य गीत

हो गया आकाश धूमिल
रजकणों की बहुलता से
डूबते दिनकर बताओ
है सुखद परिदृश्य कैसा।

नील नभ है रक्तवर्णी
प्रीति की परिकल्पना से
सांध्य गीतों में लिखा यह
दिवस का वैशिष्ट्य कैसा।

शिथिल होती जा रही हैं
तीव्र वेगी तीक्ष्ण किरणें
क्षितिज के उस पार जातीं
यह विहंगम दृश्य कैसा।

रातरानी के हृदय में
उठ रही मद्धिम तरंगें
मौन की अनुभूतियों में
शब्द का अस्पृश्य कैसा।

मंद गति से तन रहा है
तिमिर का वितान सुन्दर
खग-विहग निशब्द सारे
निशा का सानिध्य कैसा।